समालखा नई अनाज मंडी स्थित जैन स्तानक मे आयोजित धर्म सभा मे प्रवचन करते उपेन्द्र मुनि ने अविवेकी व्यक्ति को अंधे के समान बताया। उन्होंने कहा कि जो बिना सोचे-समझे या बिना विवेक के काम करता है वह अंधे जैसा है,क्योकि अंधा व्यक्ति मार्गदर्शन के बिना अंधों का अनुसरण करता है। यह अज्ञानता, मूर्खता और आत्म-ज्ञान से दूर रहने की स्थिति को दर्शाता है, जहाँ व्यक्ति अपना जीवन अर्थहीन कार्यों में लगाता है और सही-गलत का भेद नहीं समझ पाता है। यह वाक्यांश अंधापन (दृष्टि का अभाव) और अविवेक (समझ या विवेक का अभाव) को एक साथ जोड़ता है, जिसका अर्थ है कि व्यक्ति न तो देख सकता है और न ही सही निर्णय ले सकता है। यह उन लोगों पर लागू होता है जो अहंकारवश खुद को ज्ञानी समझते हैं, लेकिन वास्तव में अज्ञानता से घिरे होते हैं और आत्म-बोध से वंचित रहते हैं।जैसे एक अंधा व्यक्ति दूसरे अंधे व्यक्ति को रास्ता दिखाता है, वैसे ही अज्ञानी लोग भी दूसरे अज्ञानियों के पीछे चलते हैं और जीवन के सही मार्ग से भटक जाते हैं।
आचार्य उपेन्द्र मुनि ने  इस बात पर जोर दिया कि यह संसार अंधा और अविवेकी है, जिस प्रकार एक अंधी गाय अपने मरे हुए बछड़े को बार-बार चाटती रहती है, उसी प्रकार मनुष्य भी नश्वर शरीर और संसार में ही मन लगाए रहता है।
उपेंद्र मुनि आगे कहते है कि
समझा समझा एक है, अन समझा सब एका।
समझा सो ही जानिए, जाके हृदय विवेका।” उन्होने कहा कि त्यागने एवं ग्रहण करने योग्य वस्तु के सम्यक ज्ञान को विवेक कहते हैं। जो सिद्धान्तों के नियमों को सीखकर उन्हें जीवन में नहीं उतारता वह वैसा ही है, जैसे खेत में मेहनत करके भी बीज नहीं बोता।
जैन मुनि उपेन्द्र महाराज ने विवेक को सबसे बड़ा गुरू बताते हुए कहा कि विवेको गुरुवत सर्व कृत्याकृत्यं प्रकाशयेता विवेक महागुरु है जो कृत्याकृत्य का बोध देता है। श्वांस के बिना दवा नहीं लगती, कान के बिना सुनाई नहीं देता, विवेक के बिना आत्मा-उन्नन्ति नहीं होती। इसीलिए भगवान महावीर ने कहा-विवेगे धम्मे माहिए। विवेक में ही धर्म है।