जींद। चौधरी रणबीर सिंह विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों के साथ हो रहे शैक्षणिक अन्याय के खिलाफ बुधवार को किसान छात्र एकता संगठन के प्रतिनिधिमंडल ने डीन ऑफ अकेडमिक से मुलाकात की। जिसमें बीएससी (भूगोल) द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों के बिना पूर्व सूचना विभाग से नाम काटे जाने पर रोष जताया। प्रतिनिधिमंडल ने डीन ऑफ अकेडमिक को अवगत कराया कि विद्यार्थियों की अंतिम परीक्षा 14 जनवरी को संपन्न हुई थी। 17 जनवरी को कक्षाएं शुरू होने की सूचना दी गई। जबकि 21 से 23 जनवरी तक विश्वविद्यालय में युवा महोत्सव आयोजित था और 26 जनवरी तक विश्वविद्यालय का आधिकारिक अवकाश घोषित था। इसके बावजूद 29 जनवरी को विभाग द्वारा तानाशाही रवैया अपनाते हुए विद्यार्थियों के नाम काट दिए गए। संगठन ने प्रशासन की दोहरी और विरोधाभासी नीति पर भी गंभीर सवाल खड़े किए। प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि विश्वविद्यालय के कई विभागों में आज तक नियमित कक्षाएं प्रारंभ ही नहीं हुई हैं। जहां कक्षाएं नहीं लग रही, वहां कोई कार्रवाई नहीं है और जहाँ विद्यार्थी नियमित रूप से कक्षाएं अटेंड कर रहे हैं, वहीं उनके नाम काटे जा रहे हैं। यह चयनात्मक कार्रवाई विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। किसान छात्र एकता संगठन के कार्यकारिणी प्रधान गोविंद सैनी ने कहा कि एक तरफ कई विभागों में कक्षाएं नहीं लग रही हैं और प्रशासन आंखें मूंदे बैठा है। दूसरी तरफ जहां कक्षाएं चल रही हैं वहीं विद्यार्थियों को निशाना बनाया जा रहा है। यह शिक्षा व्यवस्था नही बल्कि छात्र विरोधी तानाशाही है। छात्र नेता विक्रम ने कहा कि यह साफ दिखाता है कि विश्वविद्यालय में नियम सबके लिए समान नहीं हैं। अगर यह भेदभाव तुरंत बंद नहीं हुआ है तो किसान छात्र एकता संगठन इस मुद्दे को आंदोलन में बदलेगा। छात्र नेता साहिल ने कहा कि जो विद्यार्थी कक्षा में आ रहे हैं, उन्हें ही दंडित किया जा रहा है। यह प्रशासनिक लापरवाही नही बल्कि छात्रों को डराने की कोशिश है। जिसे किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा। प्रतिनिधिमंडल ने स्पष्ट किया कि यह मामला अब केवल एक कक्षा या एक विभाग का नही बल्कि छात्र अधिकारों, सम्मान, नियमों और विश्वविद्यालय की जवाबदेही से जुड़ा प्रश्न बन चुका है। डीन ऑफ अकेडमिक ने विषय पर शीघ्र निर्णय लेने का आश्वासन दिया। किसान छात्र एकता संगठन ने चेताया कि यदि जल्द ही इस छात्र विरोधी निर्णय को वापस नहीं लिया गया तो विश्वविद्यालय स्तर पर व्यापक आंदोलन किया जाएगा। जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।