अंबाला। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के जिला सचिव का. सतीश सेठी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर बताया कि जैसे-जैसे भारत-अमेरिका व्यापार समझौते का ब्यौरा सामने आ रहा है, यह साफ हो रहा है कि बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने तथाकथित ‘अंतरिम समझौते’ में अमेरिका को बड़ी रियायतें दी गई हैं। ये रियायतें भारत की अर्थव्यवस्था, कृषि और राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए एक गंभीर खतरा हैं। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध अधूरी जानकारी के अनुसार भी, भारत सरकार ने अमेरिका से फलों, कपास, मेवे, सोयाबीन तेल और कुछ अन्य खाद्य और कृषि उत्पादों के निर्यात पर कोई टैरिफ (जीरो टैरिफ) नहीं लगाने पर सहमति जताई है। यह फैसला देश भर के लाखों सेब उत्पादकों, कपास और सोया किसानों की आजीविका को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाएगा। सीपीएम नेता ने बताया कि हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर और अन्य राज्यों के सेब उत्पादक किसान पहले से ही न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ पहले हुए व्यापार समझौतों के कारण परेशान हैं। अमेरिका के साथ यह मौजूदा समझौता उनकी आजीविका को और ज्यादा बर्बाद कर देगा। कपास किसानों पर पहले से ही बढ़ती लागत और गहरे कृषि संकट का बोझ है, उन्हें भी इसी तरह की तबाही का सामना करना पड़ेगा। सेठी ने बताया कि रिपोर्ट यह भी बताती हैं कि भारत सरकार ने खाद्य और कृषि उत्पादों पर गैर-टैरिफ बाधाओं को हटाने पर सहमति जताई है। इसका सीधा मतलब होगा भारतीय किसानों के लिए समर्थन और सब्सिडी को खत्म करना, जिससे वे भारी सब्सिडी वाले अमेरिकी कृषि उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने के लिए मजबूर होंगे और भारतीय कृषि तेजी से अलाभकारी हो जाएगी। यह व्यापार समझौता हमारी संप्रभुता को एक झटका है, क्योंकि अमेरिका हमारी नीतियों को तय कर रहा है, जिसमें रूस से तेल खरीदने के हमारे फैसले भी शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जारी कार्यकारी आदेश इन निदेर्शों के पालन का आकलन करने के लिए एक निगरानी तंत्र स्थापित करता है और अगर इनका उल्लंघन किया जाता है तो टैरिफ लगाने की धमकी देता है। यह बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार का एक शर्मनाक आत्मसमर्पण है। यह बेहद निंदनीय है कि सरकार ने अमेरिकी रक्षा आपूर्ति पर अपनी निर्भरता बढ़ाने का वादा किया है, जो भारत के रणनीतिक हितों के लिए हानिकारक होगा। सीपीआई (एम) अपनी मांग दोहराती है कि समझौते का पूरा विवरण तुरंत संसद के सामने रखा जाए और उसे सार्वजनिक किया जाए। सरकार को ऐसे किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए जो भारतीय श्रमिकों, किसानों और आम लोगों के हितों के लिए हानिकारक हो।