अंबाला। गीता नगरी स्थित सत्संग भवन में स्वामी गीतानंद वीरजी महाराज का निर्वाण दिवस असीम श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालुओं ने महाराज जी के श्रीचरणों में श्रद्धा सुमन अर्पित कर उनके बताए आध्यात्मिक मार्ग को स्मरण किया। भारत भूमि की यह विशेषता रही है कि यहां समय-समय पर ईश्वर की विभूति धारण किए हुए महापुरुषों का अवतरण हुआ है, जिन्होंने देश को विश्व गुरु की गरिमा प्रदान की। ऐसे ही स्वामी गीतानंद वीरजी महाराज का अवतरण 20 नवंबर 1929 को हुआ। वे परमात्मा की विशेष कृपा से संपन्न संत थे। उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में आत्मोद्धार, चेतना विकास तथा ज्ञान, भक्ति और कर्म के माध्यम से जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करने का संदेश दिया। वीर जी महाराज ने श्रीमद् भगवद् गीता को अपना प्रमुख शस्त्र बनाकर लगभग 55 वर्षों तक प्रात: और सायं निरंतर गीता पर प्रवचन दिए। दिनभर वे गीता प्रचार कार्यों की देखरेख और श्रद्धालुओं की आध्यात्मिक समस्याओं के समाधान में संलग्न रहते थे। उनका संपूर्ण जीवन मानव कल्याण और आध्यात्मिक उत्थान को समर्पित रहा। सृष्टि कर्ता की इच्छा के अनुरूप 16 जनवरी 2004 को वे अपने स्थूल शरीर का त्याग कर विराट परमात्मा में लीन हो गए। उनके द्वारा प्रारंभ किए गए गीता प्रचार से संबंधित सभी सेवा कार्य आज भी श्री गीता सत्संग ट्रस्ट, अंबाला शहर के माध्यम से निरंतर सुचारू रूप से संचालित किए जा रहे हैं। ट्रस्ट के समर्पित सदस्य पूरी निष्ठा और निष्काम भाव से इन सेवाओं को आगे बढ़ा रहे हैं। निर्वाण दिवस पर महाराज जी के अनुयायियों ने इसे आज्ञा पालन उत्सव के रूप में मनाया। इस अवसर पर 21 दिवसीय अनुष्ठान संपन्न हुआ, जिसमें प्रतिदिन सत्संग, हवन, यज्ञ एवं प्रसाद की व्यवस्था की गई। श्रद्धालुओं ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार अनेक पुण्य कार्य किए। लगभग ढाई घंटे चले हवन के पश्चात समष्टि भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें करीब 2000 श्रद्धालुओं ने भोजन प्रसाद ग्रहण किया। कार्यक्रम के अंत में ट्रस्ट के सदस्यों ने सभी श्रद्धालुओं का हृदय से आभार व्यक्त किया।