चंडीगढ़ विजिलेंस विभाग भ्रष्टाचार से निपटने में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। विभाग को मिली शिकायतों की तुलना में कार्रवाई बहुत कम हो रही है, जिससे शिकायतकर्ताओं में विश्वास की कमी बढ़ रही है। 2023 से 2025 के बीच 37 शिकायतों में से केवल 7 पर नियमित जांच शुरू हुई और कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई।
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि विजिलेंस में कार्यरत पुलिस कर्मी स्थानीय बल से आते हैं, जिससे आरोपी या अधिकारियों से उनके व्यक्तिगत संबंध बने रहते हैं। इससे शिकायतकर्ताओं को डर रहता है कि उनकी पहचान उजागर हो सकती है या कार्रवाई में ढिलाई होगी। वहीं सीबीआई में शिकायतकर्ताओं को निष्पक्ष जांच की अधिक उम्मीद रहती है।
सूत्रों के अनुसार, विभागीय कमी और संसाधनों की अनुपलब्धता ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। 2018-19 के बीच लंबित मामलों की संख्या 11 से बढ़कर 23 हो गई, जिनमें से कई दो वर्षों से अधिक समय से लंबित हैं। म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में भर्ती घोटाले और वेतन प्रक्रिया में अनियमितताओं जैसे मामलों ने भी विभाग की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं।
स्थानीय निकायों में भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों, जैसे प्रवर्तन विंग में ₹50-60 करोड़ की उगाही, में उच्च अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच रिश्तों के कारण जांच प्रभावित हो रही है। बेलदार विकास जैसे मामलों में शिकायतकर्ताओं पर दबाव डालने की खबरें सामने आई हैं।
केंद्रीय सतर्कता आयोग के दिशानिर्देशों के बावजूद विभाग समयबद्ध जांच पूरी करने में असफल रहा है। वहीं सीबीआई ने अधिक सक्रियता दिखाई—2023-25 में उसने 24 लोगों को गिरफ्तार किया, जबकि विजिलेंस ने केवल 3 गिरफ्तारियां कीं।

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चंडीगढ़ विजिलेंस विभाग को भ्रष्टाचार से निपटने में कई संरचनात्मक और प्रक्रियात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विश्वास की कमी, सीमित कार्रवाई, कर्मचारियों की कमी, और स्थानीय प्रभाव जैसे मुद्दे विभाग की प्रभावशीलता को प्रभावित कर रहे हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए विभाग को जांच प्रक्रिया को तेज करना, गोपनीयता सुनिश्चित करना, और जनता में विश्वास बहाल करने हेतु जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है।