जींद। माता चन्नन देवी आर्य कन्या गुरूकुल पिल्लूखेड़ा में मंगलवार को श्रद्धेय स्वामी श्रद्धानंद की पुण्यतिथि पर कार्यक्रम का अयोजन किया गया। कार्यक्रम में गुरूकुल प्रबंधन, अध्यापकों एवं स्टाफ ने स्वामी श्रद्धानंद को श्रद्धापूर्वक नमन किया।
प्रधानाचार्य ज्योति ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि स्वामी श्रद्धानंद का जीवन अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ते मानवीय संघर्ष का उदाहरण है। स्वामी दयानंद के सान्निध्य में उनका जीवन समाज सुधार और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित हो गया। उन्होंने गुरुकुल शिक्षा, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, ब्रह्मचर्य, शुद्धि आंदोलन के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए। स्वामी श्रद्धानंद ने उन हिंदुओं के पुनर्वास का शुद्धि आंदोलन चलाया जो विभिन्न मतों में चले गए थे। इससे विचलित होकर 23 दिसंबर 1926 को अब्दुल रशीद ने दिल्ली में उनकी हत्या कर दी थी। उन्होंने कहा कि शुद्धि आंदोलन को आगे बढ़ाना ही स्वामी श्रद्धानंद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। स्वामी श्रद्धानंद ने अनेकों गुरुकुलों का शुभारंभ किया, भारत के सोए हुए जनमानस को ज्ञान और विज्ञान से जागृत कर, तप, त्याग, पुरुषार्थ, परोपकार से समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रेरित किया।
अध्यापिका किरण ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के प्रवर्तक एवं शुद्धि आंदोलन के अभियोजक स्वामी श्रद्धानंद रहे हैं। स्वामी जी का संपूर्ण जीवन त्याग, तप, सेवा और वेद, धर्म के प्रचार को समर्पित रहा।
अध्यापिका पूजा ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद ने 1902 में हरिद्वार के पास कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की। जो अब गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है। समाज सुधार, छुआछूत, जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। जबरन धर्म परिवर्तन करने वाले हिंदुओं की घर वापसी के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई। गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और हिन्दू, मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे। उन्होंने अपने आचरण और विचारों से शिष्यों को सत्य, अनुशासन और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
प्रधानाचार्य ज्योति ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि स्वामी श्रद्धानंद का जीवन अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ते मानवीय संघर्ष का उदाहरण है। स्वामी दयानंद के सान्निध्य में उनका जीवन समाज सुधार और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित हो गया। उन्होंने गुरुकुल शिक्षा, स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, ब्रह्मचर्य, शुद्धि आंदोलन के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किए। स्वामी श्रद्धानंद ने उन हिंदुओं के पुनर्वास का शुद्धि आंदोलन चलाया जो विभिन्न मतों में चले गए थे। इससे विचलित होकर 23 दिसंबर 1926 को अब्दुल रशीद ने दिल्ली में उनकी हत्या कर दी थी। उन्होंने कहा कि शुद्धि आंदोलन को आगे बढ़ाना ही स्वामी श्रद्धानंद के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। स्वामी श्रद्धानंद ने अनेकों गुरुकुलों का शुभारंभ किया, भारत के सोए हुए जनमानस को ज्ञान और विज्ञान से जागृत कर, तप, त्याग, पुरुषार्थ, परोपकार से समाज और राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रेरित किया।
अध्यापिका किरण ने छात्राओं को संबोधित करते हुए कहा कि गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति के प्रवर्तक एवं शुद्धि आंदोलन के अभियोजक स्वामी श्रद्धानंद रहे हैं। स्वामी जी का संपूर्ण जीवन त्याग, तप, सेवा और वेद, धर्म के प्रचार को समर्पित रहा।
अध्यापिका पूजा ने कहा कि स्वामी श्रद्धानंद ने 1902 में हरिद्वार के पास कांगड़ी में गुरुकुल की स्थापना की। जो अब गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है। समाज सुधार, छुआछूत, जातिवाद और सामाजिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। जबरन धर्म परिवर्तन करने वाले हिंदुओं की घर वापसी के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई। गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और हिन्दू, मुस्लिम एकता के पक्षधर रहे। उन्होंने अपने आचरण और विचारों से शिष्यों को सत्य, अनुशासन और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
