पंजाब के होशियारपुर जिले में बसे कई गाँव ऐसे हैं, जहाँ के लोग चार दशक से सिर्फ एक ही सवाल कर रहे हैं — “हमारे यहाँ ट्रेन कब आएगी?” यह सवाल सिर्फ आवाजाही से जुड़ा नहीं, बल्कि सपनों और उम्मीदों से भरा है। नांगल डैम से शुरू होकर तलवाड़ा तक पहुँचने वाली इस रेलवे लाइन की योजना 1980 के दशक की शुरुआत में बनी थी। उस समय गांववालों को बताया गया था कि जल्द ही ट्रेन की आवाज गाँव में गूंजेगी। लेकिन आज, 40 साल बाद भी ट्रैक तो बना है, पर ट्रेन नहीं आई।

शुरुआत में उम्मीदें, अब थकान

जब यह परियोजना शुरू हुई थी, तो लोगों ने ज़मीन दी, घरों से हटकर रहने लगे और बच्चों को यह कहकर समझाया कि “अब ट्रेन आएगी, तुम्हारा भविष्य बदलेगा।” समय बीतता गया, सरकारें बदलती रहीं, और लोग बूढ़े हो गए — लेकिन ट्रेन अब भी नहीं आई। जिन बच्चों ने रेल के सपने देखे थे, वे आज खुद अपने बच्चों को वही सपना दिखा रहे हैं।

talwara train project 40years delay

काम हुआ, पर अधूरा

इस प्रोजेक्ट पर अब तक लगभग 2000 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। नांगल से दौलतपुर चौक तक ट्रैक बिछ गया है, लेकिन दौलतपुर से तलवाड़ा तक का हिस्सा अब भी अधूरा है। इस 23 किलोमीटर की दूरी में कहीं ज़मीन का मामला उलझा हुआ है, तो कहीं निर्माण कार्य अटक गया है। बिजली की लाइनों, पानी की पाइपों और पर्यावरण स्वीकृति जैसे कई कारणों ने इसे थाम रखा है।

ज़मीन का विवाद बना सबसे बड़ी रुकावट

गाँव के किसानों का कहना है कि उन्हें बहुत कम मुआवज़ा मिला, जबकि दूसरे क्षेत्रों में ज़मीन की कीमत कई गुना ज़्यादा थी। इससे न सिर्फ़ नाराज़गी फैली, बल्कि कई मामलों में लोग कोर्ट तक पहुँच गए। जब तक ज़मीन का यह मामला पूरी तरह सुलझेगा नहीं, तब तक रेलवे लाइन की कहानी अधूरी ही रहेगी।

सरकारी वादे और नई उम्मीदें

हाल के दिनों में सरकार ने इसे फिर से प्राथमिकता में लेने की बात कही है। रेलवे विभाग की ओर से यह भी कहा गया है कि अब काम में तेज़ी लाई जाएगी और इस लाइन को 2027 तक पूरा कर दिया जाएगा। गाँव के लोग फिर से उम्मीद करने लगे हैं — शायद अबकी बार ट्रेन सच में आ जाए।

गाँव वालों की सोच

गाँव के एक बुज़ुर्ग कहते हैं, “बचपन में सुना था कि ट्रेन आएगी, अब पोते को वही बात सुना रहा हूँ। पर अब लगता है, शायद उसके बच्चे ही देखेंगे।” यह एक व्यथा है, जो कई गाँवों में समान रूप से गूंजती है — सपना देखा गया, ज़मीन दी गई, इंतज़ार किया गया, लेकिन नतीजा आज भी अधूरा है।

निष्कर्ष

यह केवल एक रेल परियोजना नहीं है — यह उन सपनों की कहानी है, जो पीढ़ियों से बस एक आवाज का इंतज़ार कर रहे हैं: रेल इंजन की सीटी। इस रेल लाइन ने विकास का वादा किया था, लेकिन साल दर साल देरी ने लोगों की उम्मीदों को थका /h3>दिया है। अब बस यही सवाल बार-बार उठता है — क्या यह ट्रेन कभी आएगी? या यह सपना यूँ ही पटरियों पर अधूरा पड़ा रहेगा?