अमेरिका द्वारा भारत में 27 अगस्त से 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जा रहा है, जिसके बाद कुल शुल्क बढ़कर 50 फीसदी हो जाएगी। इसको लेकर निर्यातक संगठनों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि अब अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पाद प्रतिस्पद्धा के मामले में पिछड़ जाएंगे। प्रतिस्पर्धा करने के लिए निर्यातकों व कारोबारियों को सस्ते दाम पर भारतीय उत्पादों को बेचना होगा। ऐसी स्थिति में घाटा होगा और भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में हिस्सेदारी घटेगी। भारतीय निर्यात संगठन महासंघ (फियो) का कहना है कि आयात शुल्क बढ़ाए जाने से भारत का अमेरिका को निर्यात बुरी तरह प्रभावित हो सकता है।
अमेरिकी बाजार में चीन, वियतनाम, कंबोडिया, फिलीपींस, अन्य दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों की तुलना में भारतीय उत्पाद प्रतिस्पर्धा से बाहर हो जाएंगे। क्योंकि इन देशों के उत्पाद भारत की तुलना में अमेरिकी बाजार में सस्ती दरों पर उपलब्ध होंगे। ऐसी स्थिति में घरेलू स्तर पर उन उद्योग को भारी नुकसान होगा, जो काफी हद तक अमेरिका को किए जाने वाले निर्यात पर निर्भर है। इनमें ज्वेलरी, कपड़ा, चमड़ा, हस्थशिल्प, इंजीनियरिंग गुड्स, रसायन व अन्य उत्पाद तैयार करने वाले उद्योग शामिल है। खासकर श्रम-प्रधान क्षेत्रों जैसे चमड़ा, सिरेमिक, रसायन, हस्तशिल्प, कालीन आदि में भी प्रतिस्पर्धा में भारी कमी आ रही है। यूरोप, दक्षिण-पूर्व एशिया और मैक्सिको के उत्पादकों के मुकाबले भारतीय उद्योग के ऑर्डर अमेरिकी बाजार से रद्द हो रहे हैं। मौजूदा स्थिति में घरेलू उद्योग को डिलीवरी में देरी और लागत लाभ समाप्त होने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जो अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने के बाद ओर बढ़ेगी।
कई क्षेत्रों के उत्पादन पर पड़ा असर तिरुपुर, नोएडा और सूरत के वस्त्र एवं परिधान निर्माता लागत प्रतिस्पर्धा में पिछड़ने के कारण उत्पादन रोक चुके हैं। यह क्षेत्र अब वियतनाम और बांग्लादेश जैसे कम लागत वाले देशों के सामने पिछड़ रहा है। वहीं, समुद्री खाद्य (विशेषकर झींगे) के मामले में अमेरिकी बाजार भारत के लगभग 40 फीसदी निर्यात की खपत करता है। शुल्क बढ़ोतरी से स्टॉक का नुकसान, आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और किसानों पर संकट बढ़ सकता है। इसी तरह से इलेक्ट्रिक, ज्वेलरी, कपड़ा और कालीन बनाने वाले उद्योगों पर भी असर पड़ रहा है जो अब अतिरिक्त शुल्क लगाए जाने के बाद बढ़ जाएगा।
संकट से निपटने के लिए उद्योग व निर्यात जगत के सुझाव
-पीएलआई योजनाओं का विस्तार, अवसंरचना को मजबूत करना, कोल्ड-चेन/स्टोरेज परिसंपत्तियों में निवेश कर प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया जाए।
-ईयू, ओमान, चिली, पेरू, जीसीसी, अफ्रीका और अन्य लैटिन अमेरिकी देशों के साथ तीव्र गति से व्यापार समझौते (एफटीए) किए जाए।
-श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिए प्रारंभिक-लाभ का प्रावधान प्राथमिकता में दिया जाए।
-ब्रांड इंडिया और नवाचार को बढ़ावा दिया जाए।
-वैश्विक ब्रांडिंग, गुणवत्ता प्रमाणन में निवेश और नवाचार को निर्यात रणनीति का हिस्सा बनाया जाए, जिससे भारतीय उत्पाद वैश्विक स्तर पर और आकर्षक बन सकें।
तत्काल कदम उठाने की जरूरत
स्थिति को देखते हुए निर्यातकों, उद्योग संगठनों और सरकारी एजेंसियों के बीच त्वरित और समन्वित कार्रवाई की जरूरत है, जिससे घरेलू उद्योग से जुड़ा रोजगार सुरक्षित रहें। दुनिया के बाकी देशों के साथ वैश्विक व्यापारिक रिश्ते मजबूत करने की दिशा में तेजी से काम हो। इस वक्त उठाए गए कदम यह तय करेंगे कि भारत बाहरी झटकों का कितना प्रभावी ढंग से सामना कर सकता है। ऋण की मूल राशि और ब्याज भुगतान पर एक वर्ष तक की मोहलत दी जाए। आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ईसीएलजीएस) जैसी योजना पर बिना गारंटी वाले ऋण की सुविधा भी दी जानी चाहिए। इससे कंपनियों का दबाव कम होगा और सरकार पर भी अधिक भार नहीं पड़ेगा।
-एससी रल्हन, अध्यक्ष -फियो
