पं. तिलकराज शर्मा ने कहा कि किसी नगर में एक राजा था जिस का नाम मंगल सिंह था। एक दिन वो घूमते घूमते वह ऐसे स्थान पर पहुंचा जहां पतिव्रता स्त्रियां स्नान कर रही थी और पूजा कर रही थी वह भी बिना किसी स्वार्थ के उस स्थान पर स्नान करने लगा। पतिव्रता स्त्रियों ने जब उसे देखा तो बिना विचार किये उसे श्राप दे दिया। तब उनमें से कुछ स्त्रियों ने कहा कि तुमने बिना विचारे इसे श्राप दे दिया है। चाहे ये भला मानव ही हो। तब राजा ने कहा कि वह विना स्वार्थ के यहां स्नान करने आया था। तब उन स्त्रियों ने उसे महालक्ष्मी के सूत्रे श्दिए। यह सूत्रे लेकर राजा जब अपने घर पहुंचा और उसने यह महालक्ष्मी के सूत्रे अपनी महारानी को दिये और कहा कि ये सुहाग को बनाने वाले महालक्ष्मी के सूत्रे है। उसकी रानी जिसके हाथ सोने, हीरे के आभूषणों से भरे हुऐ थे। अहंकार से उसने सूत्रों को कूड़ेदान में फेंक दिया। सुबह जब उसकी नौकरानी कूड़े के पास गई तो कूड़े में सोने, हीरे जवाहरात आदि पड़े हैं। उसने विचार किया कि शायद कोई चोर चोरी करने आया होगा तो यह आभूषण आदि गिर गये होंगे। उसने रानी को आवाज दी रानी जी आकर कूड़ा उठवा दो। रानी गुस्से के साथ आई और बोली कि मुझे कूड़ा उठवाने के लिए कह रही हो। इससे उसे महालक्ष्मी की अविज्ञा पड़ गई। महालक्ष्मी की अविज्ञा पड़ने से तब वह जिस स्थान पर जाती वह नष्ट हो जाता था। जिस जंगल से गुजरती उसमें आग लग जाती। वह इतनी कुरूप हो गई कि लोग उसे पागल समझकर उस पर पत्थर आदि मारने लगे। चलते चलते वह एक घने जंगल में एक फकीर की कुटिया के पास गई, उस फकीर ने उसे अपनी बेटी बनाकर आश्रय दिया। बारह साल बाद उसकी विपदा दूर होने को आई। उसी जंगल की ओर शिकार खेलने के लिए गया। राजा को भूख लगी उसने अपने सेवक को कहा कि मेरे लिए तीतर भून कर लाओ। वह सेवक उसी फकीर की कुटिया में तीतर भूनने के लिए जा पहुंचा। उसने देखा कि फकीर की कुटिया में एक सुन्दर स्त्री रह रही है। वह उसकी ओर देखते देखते तीतर भूनने लगा तो तीतर जल गया। तीतर जल जाने पर राजा के डर से वह सेवक रोने लगा तब रानी ने उस तीतर को अच्छी तरह से दूध डालकर ठीक कर दिया। जब राजा ने उस तीतर को खाया तो उसने सेवक से पूछा कि बताओ यह तीतर किसने भूना है। तो उसने कहा कि मैंने। राजा ने कहा नहीं तुम झूठ बोलते हो।  ऐसा तीतर तो मेरी रानी बनाती थी। तब सेवक उसे कुटिया में ले गया वहां राजा ने अपनी रानी को पहचान लिया और उसे अपने साथ चलने के लिए कहा। लेकिन उस फकीर ने कहा कि तुम कैसे पति हो जिसने बारह वर्ष तक अपनी पत्नी की सुध नहीं ली। राजा ने कहा उस समय रानी पर महालक्ष्मी की अविज्ञा थी । अब खत्म हो गई। तब फकीर ने कहा कि बेटी को ऐसे नहीं विदा किया जाता। तुम जाओ जौ पेवे ले आओ। इस प्रकार फकीर ने रानी को राजा के साथ विदा कर दिया। महालक्ष्मी सुहाग को मिलाने वाली है।