संवतश्री पर्व के पावन अवसर पर पानीपत का वातावरण धर्ममय और मंगलमय बन गया। पर्वधिराज, पर्वों का बादशाह कहे जाने वाला यह संवतश्री पर्व क्षमा, मैत्री और प्रेम का संदेश लेकर आया।
युवा प्रेरक आगमज्ञाता योगीराज श्री अरुण चंद्र जी महाराज एवं उनके शिष्य श्री अभिषेक मुनि जी और श्री अभिनंदन मुनि जी ने अपने मंगल वचनों से विशाल जनसमूह को धर्म की अमृतवाणी सुनाई।
श्री महाराज ने कहा कि –रखना है बैर नहीं, अमृत ही पीना है और अमृत ही पिलाना है। पीना है जहर नहीं, यह पर्व है क्षमा का, जिसे सभी गणधरों ने गाया है।
उन्होंने आगे कहा कि श्रमण संस्कृति के तीन प्रमुख पर्व माने जाते हैं – पखी, चौमासी और संवतश्री। यह पर्व करुणा का झरना है। भादवा सुदी पंचमी को सृष्टि का पहला दिन कहा गया, जब मानव शाकाहार की ओर बढ़ा और शांति का द्वार खुला।
संवतश्री पर्व का संदेश:
क्षमा पर्व केवल जैन समाज का नहीं, बल्कि मानव मात्र के कल्याण का पर्व है।
इसे मैत्री दिवस, प्रेम दिवस और क्षमा दिवस भी कहा जाता है।
प्रतिक्रमण के समय क्षमापना के भाव आने चाहिए।
मुनि श्री ने बताया कि जिसने क्षमा को हृदय से स्वीकार किया, उसकी मानसिक पीड़ाएँ और तनाव दूर हो जाते हैं। क्षमा आत्मा का अलंकार है और यही सच्चे जीवन का विज्ञान है।
विशाल प्रांगण में आयोजित इस संवतश्री महोत्सव में श्रद्धालुओं ने भाव-विभोर होकर क्षमा, शांति और समता का संदेश ग्रहण किया। वातावरण में धर्म-आनंद और हर्षोल्लास छा गया।
सुभाष जैन ने बताया की कई मास खामण हुये है ओर हो रहे है सेंकड़ों के करीब अठाई चल रही है पूरे पानीपत जैन समाज में लगभग एक हजार पोषध हुये है। पानीपत का चातुर्मास ऐतिहासिक चातुर्मास बन गया है जैन स्थानक का विशाल हॉल भी छोटा पड़ गया है आज के दिन वह भी आया जो सालभर में भी नहीं आता गुरुदेव जी एक सितंबर को सुबह स्थान परिवर्तन कर अंसल जैन स्थानक में जाएंगे ओर कुछ समय
वहा लगाकर फिर वापिस यही आ जाएगे। इस अवसर पर एक प्रेरणादायी सराहनीय नाटिका का मंचन भी हुआ।
पानीपत में संवतश्री पर्व का भव्य आयोजन
